वर्तमान समय में तनाव एवं दुश्चिंता का प्रकोप व्यक्ति- व्यक्ति के ऊपर इस कदर छाया हुआ है कि आज हमारा जीवन एक बोझ में बदल गया है। लोगों के चेहरे से हंसी -मुस्कुराहट विदा हो चली है। घर परिवार में अनावश्यक कलह का वातावरण चिंताजनक है। समाज विघटन के हाथों चढ़ा हुआ है। हिंसा, आतंक अराजकता के अलावे तरह-तरह की व्याधियों ने मनुष्य के शरीर पर हमला बोल दिया है, फलस्वरूप जो जीवन हर्ष, उल्लास, प्रसन्नता से सिक्त होना चाहिए था, वह बेहद हैरान, परेशान, दुखी, चिंतित दिखाई पड़ता है। जो जीवन शांति- प्रेम और सद्भावना से भरा -पूरा होना चाहिए था उसमें समस्याओं का अंबार लगा हुआ है। इसमें अश्लील गानों की कर्कश ध्वनि, दिल दहलाने वाली आवाज, रोड छाप मनचले युवकों की छेड़खानी, छींटाकशी, नशे के बेलगाम बढ़ते प्रकोप ने प्रायः सभीपर्वों में, छठ पर्व को छोड़कर, रंग में भंग घोल दिया है। विधि व्यवस्था की स्थिति भगवान भरोसे है. . . . . !
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